
नई दिल्ली: मध्य-पूर्व (Middle East) में बढ़ते तनाव के बीच भारत की कूटनीति में एक बड़ा और दिलचस्प मोड़ देखने को मिला है। शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान से फोन पर लंबी बातचीत की। इस बातचीत के समय और भारत द्वारा अपनाए गए रुख ने दुनिया भर के कूटनीतिक विशेषज्ञों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
22 देशों के साझा बयान से भारत ने बनाई दूरी
शनिवार को ही संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के विदेश मंत्रालय ने ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ में व्यापारिक जहाजों पर हुए हमलों को लेकर एक कड़ा निंदा प्रस्ताव जारी किया। इस बयान पर अमेरिका और ब्रिटेन सहित 22 देशों ने हस्ताक्षर किए और सीधे तौर पर ईरान की आलोचना की। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि भारत इन 22 देशों की सूची में शामिल नहीं था।
भारत का यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले भारत ने खाड़ी देशों के साथ बातचीत में ईरानी हमलों की निंदा की थी। इस बार ईरान का नाम न लेना भारत की कूटनीति में एक सोची-समझी दूरी का संकेत देता है।
पीएम मोदी की बातचीत के 3 बड़े संकेत
ऊर्जा सुरक्षा की चिंता (Energy Security): पीएम मोदी ने बातचीत के दौरान ‘क्षेत्र के अहम ऊर्जा ढांचों पर हो रहे हमलों’ की निंदा की। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इससे ग्लोबल तेल सप्लाई पर बुरा असर पड़ा है। बिना किसी देश का नाम लिए भारत ने संदेश दिया कि उसकी प्राथमिकता अपनी अर्थव्यवस्था और तेल की कीमतों को स्थिर रखना है।
रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): 22 देशों के गुट का हिस्सा न बनकर भारत ने साफ कर दिया है कि वह किसी के दबाव में अपनी विदेश नीति तय नहीं करेगा। इज़राइल के साथ मजबूत रिश्तों के बावजूद, भारत ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और व्यापारिक (जैसे चाबहार पोर्ट) संबंधों को दांव पर नहीं लगाना चाहता।
संतुलनकारी शक्ति (The Balancer): मार्च की शुरुआत में पीएम मोदी ने इज़राइली पीएम नेतन्याहू से बात की थी और अब ईरानी राष्ट्रपति से। यह दिखाता है कि भारत इस क्षेत्र में एक ‘मध्यस्थ’ या संतुलन बनाने वाली शक्ति के रूप में खुद को स्थापित कर रहा है, जो दोनों पक्षों से संवाद करने की क्षमता रखता है।
क्या रुख बदल रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह रुख पिछले बयानों से ‘उलट’ तो नहीं, लेकिन ‘अलग’ जरूर है। भारत अब सीधे टकराव के बजाय शांति और बातचीत के जरिए सप्लाई चेन को बहाल करने पर जोर दे रहा है। ईरान के साथ यह संवाद व्यापारिक मार्ग (INSTC) और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।

