नई दिल्ली/गाजियाबाद: पिछले 13 वर्षों से ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (कोमा) में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे गाजियाबाद के हरीश राणा की दर्दभरी जंग आखिरकार खत्म हो गई। दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल में निधन के बाद बुधवार सुबह 9 बजे दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित शवदाह गृह में नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी गई।
हादसे ने छीन ली थी मुस्कान
अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन चंडीगढ़ में इंजीनियरिंग के छात्र रहे हरीश अपनी बहन से फोन पर बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। 19 साल की उम्र में हुए इस हादसे ने उन्हें बिस्तर पर ला दिया। 13 साल तक हरीश न बोल सके, न हिल सके; उनकी सांसें केवल मशीनों के सहारे चल रही थीं।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची माता-पिता की गुहार
बेटे को तिल-तिल मरता देख माता-पिता ने हार नहीं मानी, लेकिन जब दर्द असहनीय हो गया तो उन्होंने न्यायपालिका से ‘सम्मानजनक मुक्ति’ (Passive Euthanasia) की मांग की। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरीश को इच्छा-मृत्यु की अनुमति दी।
अंतिम समय और विदाई
14 मार्च: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हरीश को एम्स में भर्ती कराया गया, जहाँ डॉक्टरों ने धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट हटाना शुरू किया।
24 मार्च: एम्स में हरीश ने अंतिम सांस ली।
25 मार्च: डॉक्टरों की सलाह पर ‘मेडिकेटेड बॉडी’ होने के कारण गाजियाबाद के बजाय दिल्ली के ग्रीन पार्क में ही अंतिम संस्कार किया गया।
इस दुखद घड़ी में गाजियाबाद की सोसाइटी के लोग बड़ी संख्या में दिल्ली पहुंचे। वहां मौजूद हर शख्स हरीश के माता-पिता के धैर्य और उनके 13 साल के संघर्ष की चर्चा कर रहा था।

