नई दिल्ली: केंद्र सरकार देश के लोकतांत्रिक ढांचे में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। सरकारी सूत्रों के हवाले से खबर है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। इस संबंध में सांसदों को तीन नए विधेयक सौंपे गए हैं, जो भविष्य की संसदीय तस्वीर को पूरी तरह बदल देंगे।
सीटों का नया गणित: राज्यों और UT का हिस्सा
प्रस्तावित नए ढांचे के तहत लोकसभा की कुल 850 सीटों का आवंटन कुछ इस प्रकार किया जा सकता है:
- राज्यों के लिए सीटें: 815
- केंद्र शासित प्रदेशों (UT) के लिए सीटें: 35 यह विस्तार देश की बढ़ती जनसंख्या और निर्वाचन क्षेत्रों में समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
महिला आरक्षण: आधी आबादी को मिलेगी नई ताकत
विधेयक में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान महिलाओं की भागीदारी को लेकर है। संविधान के अनुच्छेद 239AA, 330A, 332A और 334A के तहत:
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई (1/3) सीटें आरक्षित की जाएंगी।
- इस आरक्षण में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की महिलाओं को भी कोटा प्रदान किया जाएगा।
- सरकार का मानना है कि इससे नीति निर्माण में महिलाओं की भूमिका और अधिक प्रभावी और मजबूत होगी।
परिसीमन आयोग की अहम भूमिका
इस पूरी प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने के लिए एक परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन किया जाएगा।
- यह आयोग जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करेगा।
- आयोग की अंतिम अधिसूचना जारी होने के बाद होने वाले अगले आम चुनावों और उपचुनावों में यह नई व्यवस्था लागू होगी।
क्यों जरूरी है यह बदलाव?
वर्तमान में लोकसभा की सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर है। पिछले 50 वर्षों में देश की जनसंख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिससे कई निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या अत्यधिक बढ़ गई है। प्रस्तावित 850 सीटों से:
- संसदीय लोकतंत्र अधिक समावेशी बनेगा।
- सांसदों और जनता के बीच संपर्क अधिक सुलभ होगा।
- क्षेत्रीय संतुलन और व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सकेगा।
